SSC GD Constable 18 February 2025 · Shift 3 · Hindi — questions with answers · ShikshaSphere
Chapter 150 of 210
18 February 2025 · Shift 3
Hindi
20 questions ~20 min readFree
20 questions
A
81
‘क्षीण’ का विलोम शब्द नीचे दिए विकल्पों में से चुनिए-
A.पुष्ट
B.अपुष्ट
C.पापी
D.कमजोर
Solution
विलोम शब्द
‘क्षीण’ का अर्थ है - दुर्बल, शक्तिहीन, क्षय को प्राप्त।
जो शक्तिहीन है उसका उलटा वह है जो बलवान और हृष्ट-पुष्ट हो, अर्थात् ‘पुष्ट’।
‘कमजोर’ तो ‘क्षीण’ का पर्यायवाची है, विलोम नहीं; ‘अपुष्ट’ भी दुर्बलता ही सूचित करता है और ‘पापी’ का अर्थ से कोई संबंध नहीं।
इसलिए सही विकल्प (a) है।
82
‘भारत को संधि प्रस्ताव अच्छा लगा।’ रेखांकित पद का विलोम कौन-सा है?
A.विग्रह
B.समास
C.असंधि
D.निःसंदेह
Solution
विलोम शब्द
रेखांकित पद ‘संधि’ है, जिसका अर्थ है - मेल, समझौता, जोड़।
राजनीति में तथा सामान्य प्रयोग में ‘संधि’ का प्रसिद्ध विलोम ‘विग्रह’ है, जिसका अर्थ है - फूट, अलगाव, युद्ध।
‘समास’ व्याकरण का पद है, ‘असंधि’ प्रचलित शब्द नहीं और ‘निःसंदेह’ का अर्थ ‘निश्चित रूप से’ है - इनमें से कोई विलोम नहीं।
इसलिए सही विकल्प (a) है।
83
‘पानी-वानी’ किस प्रकार के युग्म रूप के अंतर्गत आएँगे?
A.विरोधी युग्म
B.पर्यायवाची
C.शब्द विलोम
D.सार्थक-निरर्थक
Solution
शब्द-युग्म का प्रकार
‘पानी-वानी’ में पहला शब्द ‘पानी’ अर्थवान है, किंतु दूसरे ‘वानी’ का कोई स्वतंत्र अर्थ नहीं है।
बोलचाल में पहले शब्द की आरंभिक ध्वनि बदलकर ऐसा निरर्थक साथी गढ़ लिया जाता है - चाय-वाय, रोटी-वोटी, काम-वाम।
ऐसे जोड़े को ‘सार्थक-निरर्थक शब्द-युग्म’ कहा जाता है, अतः यह न विरोधी युग्म है, न पर्यायवाची, न विलोम।
इसलिए सही विकल्प (d) है।
84
चौपाल ____। उपयुक्त वाक्य से रिक्त स्थान की पूर्ति करें।
A.वह जगह होती है, जहाँ गाँव के लोग सार्वजनिक मुद्दों पर चर्चा हेतु एकत्र होते हैं।
B.वह जगह होती है, जहाँ गाँव के लोग पशुओं का गोबर एकत्रित करते हैं।
C.वह जगह होती है, जहाँ गाँव के लोग पानी भरते हैं।
D.वह जगह होती है, जहाँ गाँव के लोग पशु चराते हैं।
Solution
वाक्य-पूर्ति
‘चौपाल’ गाँव का वह सार्वजनिक स्थान है जहाँ ग्रामवासी एकत्र होकर आपसी तथा गाँव के मुद्दों पर विचार-विमर्श करते हैं।
यही पंचायत के बैठने, विवाद सुलझाने और मेल-मिलाप का केंद्र होती है।
गोबर एकत्र करने का स्थान ‘घूरा’, पानी भरने का स्थान ‘पनघट/कुआँ’ और पशु चराने का स्थान ‘चरागाह’ कहलाता है - अतः (b), (c), (d) चौपाल की परिभाषा नहीं देते।
इसलिए सही विकल्प (a) है।
85
इनमें से किस वाक्य में त्रुटि नहीं है?
A.मैंने यह कहानी पढ़ी है।
B.यह एक आम का है।
C.यह मेरा पुस्तक है।
D.गया था मैं कानपुर
Solution
शुद्ध वाक्य का चयन
विकल्प (a) ‘मैंने यह कहानी पढ़ी है।’ में कर्ता के साथ ‘ने’ का प्रयोग ठीक है और कर्म ‘कहानी’ स्त्रीलिंग होने से क्रिया ‘पढ़ी’ भी स्त्रीलिंग है - लिंग-मेल शुद्ध है।
(b) में ‘आम का’ के बाद संज्ञा ही नहीं है, इसलिए वाक्य अधूरा है।
(c) में ‘पुस्तक’ स्त्रीलिंग है, अतः ‘मेरा’ नहीं, ‘मेरी पुस्तक’ होना चाहिए।
(d) में पदक्रम अशुद्ध है; शुद्ध रूप ‘मैं कानपुर गया था।’ होगा।
इसलिए सही विकल्प (a) है।
86
‘मुमुक्षु’ शब्द के लिए सही वाक्य होगा-
A.मोक्ष प्राप्त करने वाला
B.मोक्ष के मार्ग को सरल बनाने वाला
C.मोक्ष की इच्छा करने वाला
D.मोक्ष के पथ पर चलने वाला
Solution
वाक्यांश के लिए एक शब्द
‘मुमुक्षु’ शब्द ‘मोक्ष’ से बना है और इसमें इच्छा-सूचक (सन्नन्त) रूप जुड़ा है।
अतः ‘मुमुक्षु’ का अर्थ है - मोक्ष की इच्छा करने वाला।
जो मोक्ष प्राप्त कर चुका हो वह ‘मुक्त’ कहलाता है, अतः विकल्प (a) भ्रामक है; (b) और (d) शब्द के मूल भाव ‘इच्छा’ को नहीं पकड़ते।
इसलिए सही विकल्प (c) है।
87
‘मैं आपका दर्शन करने आया हूँ।’ इस वाक्य में कहाँ अशुद्धि है?
A.आया
B.आपका
C.दर्शन
D.करने
Solution
वाक्य-शुद्धि
हिंदी में ‘दर्शन’ शब्द आदर के अर्थ में सदा बहुवचन रूप में प्रयुक्त होता है - ‘दर्शन होना’, ‘दर्शन करना’।
बहुवचन संज्ञा के साथ उसका संबंधवाचक सर्वनाम भी बहुवचन होगा, अतः ‘आपका’ के स्थान पर ‘आपके’ आएगा।
शुद्ध वाक्य - ‘मैं आपके दर्शन करने आया हूँ।’
‘आया’, ‘दर्शन’ और ‘करने’ अपने-अपने स्थान पर शुद्ध हैं; अशुद्धि केवल ‘आपका’ में है।
इसलिए सही विकल्प (b) है।
88
निम्नलिखित वाक्य के किस खंड में अशुद्धि है?
अधिकांस धन व्यर्थ गया।
A.धन
B.अधिकांस
C.गया
D.व्यर्थ
Solution
वर्तनी अशुद्धि
वाक्य ‘अधिकांस धन व्यर्थ गया।’ में ‘अधिकांस’ की वर्तनी अशुद्ध है।
यह शब्द ‘अधिक + अंश’ से बना है, इसलिए अंत में दंत्य ‘स’ नहीं, तालव्य ‘श’ आएगा - शुद्ध रूप ‘अधिकांश’।
शुद्ध वाक्य - ‘अधिकांश धन व्यर्थ गया।’; शेष खंड ‘धन’, ‘व्यर्थ’ और ‘गया’ शुद्ध हैं।
इसलिए सही विकल्प (b) है।
89
‘इस क्षेत्र में मकान तो छोड़ो, उचित ढंग से ____।’ प्रतिदिन की बोलचाल में प्रयोग किए जाने वाले उचित सार्थक-निरर्थक शब्द-युग्म का चयन करके वाक्य पूर्ण करें-
A.सड़कें-नालियाँ भी नहीं बनी हैं
B.गलियाँ-पोखर भी नहीं बने हैं
C.सड़कें-बड़के भी नहीं बनी हैं
D.सड़क-गली भी नहीं बनी है
Solution
सार्थक-निरर्थक शब्द-युग्म
प्रश्न ऐसा युग्म माँगता है जिसका पहला शब्द अर्थवान (सार्थक) और दूसरा अर्थहीन (निरर्थक) हो।
(a) ‘सड़कें-नालियाँ’, (b) ‘गलियाँ-पोखर’ तथा (d) ‘सड़क-गली’ - इन तीनों में दोनों ही शब्द अपने-अपने अर्थ रखते हैं, अतः ये सार्थक-सार्थक युग्म हैं।
(c) में ‘सड़कें’ सार्थक है, किंतु ‘बड़के’ का कोई स्वतंत्र अर्थ नहीं - यह बोलचाल में तुक मिलाकर गढ़ा गया निरर्थक साथी है।
पूर्ण वाक्य - ‘इस क्षेत्र में मकान तो छोड़ो, उचित ढंग से सड़कें-बड़के भी नहीं बनी हैं।’
इसलिए सही विकल्प (c) है।
90
‘नदी’ का पर्याय निम्न में से है-
A.अब्धि
B.गिरि
C.तटिनी
D.चपला
Solution
पर्यायवाची शब्द
‘तटिनी’ का अर्थ है - तटवाली, अर्थात् नदी; नदी के अन्य पर्याय हैं सरिता, तरंगिणी, आपगा, निम्नगा।
‘अब्धि’ समुद्र का, ‘गिरि’ पर्वत का और ‘चपला’ बिजली (तथा लक्ष्मी) का पर्यायवाची है।
इसलिए सही विकल्प (c) है।
91
‘मुझे रमेश से सहायता मिला थी।’ स्त्रीलिंग की दृष्टि से वाक्य का शुद्ध रूप है-
A.मुझे रमेश से सहायता मिली थी।
B.मुझे रमेश से सहायता मिलता था।
C.मुझे रमेश से सहायता मिला था।
D.मुझे रमेश से सहायता मिलती है।
Solution
लिंग के अनुसार वाक्य-शुद्धि
‘सहायता’ स्त्रीलिंग संज्ञा है, अतः उससे मेल खाने वाली क्रिया भी स्त्रीलिंग रूप में आएगी।
भूतकाल का स्त्रीलिंग रूप ‘मिली थी’ है; ‘मिला था’ और ‘मिलता था’ पुल्लिंग होने से अशुद्ध हैं।
विकल्प (d) ‘मिलती है’ लिंग तो ठीक रखता है, पर मूल वाक्य का भूतकाल बदलकर वर्तमान कर देता है।
शुद्ध वाक्य - ‘मुझे रमेश से सहायता मिली थी।’
इसलिए सही विकल्प (a) है।
92
‘इस जीवन में अनेक अध्याय हैं जो सम्पूर्ण सृष्टि को प्रभावित करते हैं।’ रेखांकित शब्द को अनेकार्थी शब्द से प्रतिस्थापित करें-
A.उद्भव
B.पृष्ठ
C.सर्ग
D.प्रवाह
Solution
अनेकार्थी शब्द
रेखांकित शब्द ‘अध्याय’ है, जिसका अर्थ है - ग्रंथ का खंड या परिच्छेद।
‘सर्ग’ अनेकार्थी शब्द है - इसका एक अर्थ ‘सृष्टि/रचना’ है और दूसरा ‘महाकाव्य का अध्याय’; यहाँ यह ‘अध्याय’ का स्थान भी लेता है और वाक्य में आए ‘सृष्टि’ से अर्थ-छटा भी जोड़ता है।
‘पृष्ठ’ केवल पन्ना है, ‘उद्भव’ का अर्थ उत्पत्ति और ‘प्रवाह’ का अर्थ बहाव - इनमें से कोई ‘अध्याय’ के स्थान पर नहीं बैठता।
प्रतिस्थापित वाक्य - ‘इस जीवन में अनेक सर्ग हैं जो सम्पूर्ण सृष्टि को प्रभावित करते हैं।’
इसलिए सही विकल्प (c) है।
93
निम्नलिखित वाक्यांश के लिए सार्थक शब्द चुनिए-
लम्बे पेट वाला
A.लंपट
B.लंबोघर
C.लंबोदर
D.लंबू
Solution
वाक्यांश के लिए एक शब्द
‘लंबोदर’ = लंब (लम्बा/बड़ा) + उदर (पेट), अर्थात् लम्बे या बड़े पेट वाला; यह गणेश जी का प्रसिद्ध नाम भी है।
‘लंपट’ का अर्थ विषयी/दुराचारी है और ‘लंबू’ लम्बे कद वाले के लिए आता है।
‘लंबोघर’ कोई शब्द नहीं - यह ‘लंबोदर’ की अशुद्ध वर्तनी मात्र है।
इसलिए सही विकल्प (c) है।
94
वाक्य के रेखांकित शब्द को नीचे दिए गए शब्दों में से संबंधित शब्द से परिवर्तित करें-
अँधेरे के पीछे ठीक से चल पाना कठिन था।
A.समीप
B.निकट
C.समय
D.कारण
Solution
उपयुक्त संबंधबोधक
वाक्य में ‘अँधेरे’ और ‘ठीक से चल न पाने’ के बीच कारण का संबंध है - अँधेरा कठिनाई का कारण है।
रेखांकित ‘पीछे’ स्थान/क्रम का बोध कराता है, इसलिए यहाँ अनुपयुक्त है; कारण बताने के लिए ‘के कारण’ आता है।
‘समीप’ और ‘निकट’ भी स्थानबोधक हैं तथा ‘समय’ कालबोधक - तीनों कारण नहीं बताते।
शुद्ध वाक्य - ‘अँधेरे के कारण ठीक से चल पाना कठिन था।’
इसलिए सही विकल्प (d) है।
95
‘छाती पर मूँग दलना’ मुहावरे का सही अर्थ इनमें से क्या होगा?
A.गुस्सा करना
B.झगड़ा करना
C.मारपीट करना
D.कष्ट पहुँचाना
Solution
मुहावरा
‘छाती पर मूँग दलना’ का शाब्दिक चित्र है - किसी के सीने पर बैठकर मूँग की दाल दलना।
इसी से इसका लाक्षणिक अर्थ बना - सामने रहकर जान-बूझकर किसी को लगातार कष्ट या पीड़ा पहुँचाना।
‘गुस्सा करना’, ‘झगड़ा करना’ और ‘मारपीट करना’ क्षणिक क्रियाएँ हैं, जबकि यह मुहावरा निरंतर सताते रहने का भाव देता है।
प्रयोग - ‘वह दिन-रात ताने देकर मेरी छाती पर मूँग दलता रहता है।’
इसलिए सही विकल्प (d) है।
96
निर्देश (प्र. 96-100): निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
सृष्टि के प्रत्येक कार्यकलाप को अनुशासित तथा सुष्ठु रूप में गतिशील देखकर उसके __(76)__ का ज्ञान होता है। अस्तित्वगत मनुष्य में आदिकाल से यह जिज्ञासा रही है। वैदिक ऋषियों ने उसके रूप-निर्माण का भरसक प्रयत्न किया, किंतु हताश होकर वे __(77)__ करके रह गए। उसका रूप स्थिर करने में स्वयं को असमर्थ मानकर उन्होंने उसे अरूप ही रहने दिया, किंतु उसे जानने की प्रक्रिया में कई नवीन रहस्यों के __(78)__ हुए। प्राचीन आर्य दो दलों में बँट गए। उनमें से एक दल तर्क और युक्ति से ब्रह्म के रूप-निर्धारण का प्रयत्न करता रहा और दूसरे दल ने उसके रूप-निर्माण में तर्क और बुद्धि की पराजय को घोषित किया। इसी दूसरे दल के मनीषियों ने यह अनुभव किया कि मन केवल उसकी सत्ता को __(79)__ से संतुष्ट नहीं है, बल्कि अधिकाधिक उस ओर आकर्षित होता जा रहा है। कभी-कभी ऐसे स्थल भी अनुभूति में आते हैं, जहाँ व्यक्ति उसके आलिंगन में स्वयं संपूर्ण विश्व को कुछ समय के लिए ऐसे भूल जाता है, मानो कोई पुरुष अपनी प्रिया के आलिंगन में स्वयं को और विश्व को भूल जाता हो। भावना के उद्गम के विषय में यह उक्ति __(80)__ ही है।
रिक्त स्थान (76) के लिए उचित विकल्प चुनिए।
A.प्रवर्धक
B.संचालक
C.नियंता
D.नियामक
Solution
गद्यांश रिक्त-स्थान
रिक्त स्थान से पहले कहा गया है कि सृष्टि का प्रत्येक कार्यकलाप अनुशासित और सुष्ठु रूप में गतिशील है।
ऐसी सुव्यवस्था देखकर जिसका ज्ञान होता है, वह उसे नियंत्रित करने वाली सत्ता है - ‘नियंता’, अर्थात् नियंत्रण करने वाला (ब्रह्म)।
आगे का पूरा गद्यांश उसी ब्रह्म के रूप-निर्धारण की चर्चा करता है, इससे यही चयन पुष्ट होता है।
‘प्रवर्धक’ बढ़ाने वाले के लिए, ‘संचालक’ चलाने वाले के लिए और ‘नियामक’ नियम बनाने/नियमन करने वाले के लिए आता है - ईश्वर-सत्ता का सीधा बोध ‘नियंता’ ही देता है।
इसलिए सही विकल्प (c) है।
97
निर्देश (प्र. 96-100): निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
सृष्टि के प्रत्येक कार्यकलाप को अनुशासित तथा सुष्ठु रूप में गतिशील देखकर उसके __(76)__ का ज्ञान होता है। अस्तित्वगत मनुष्य में आदिकाल से यह जिज्ञासा रही है। वैदिक ऋषियों ने उसके रूप-निर्माण का भरसक प्रयत्न किया, किंतु हताश होकर वे __(77)__ करके रह गए। उसका रूप स्थिर करने में स्वयं को असमर्थ मानकर उन्होंने उसे अरूप ही रहने दिया, किंतु उसे जानने की प्रक्रिया में कई नवीन रहस्यों के __(78)__ हुए। प्राचीन आर्य दो दलों में बँट गए। उनमें से एक दल तर्क और युक्ति से ब्रह्म के रूप-निर्धारण का प्रयत्न करता रहा और दूसरे दल ने उसके रूप-निर्माण में तर्क और बुद्धि की पराजय को घोषित किया। इसी दूसरे दल के मनीषियों ने यह अनुभव किया कि मन केवल उसकी सत्ता को __(79)__ से संतुष्ट नहीं है, बल्कि अधिकाधिक उस ओर आकर्षित होता जा रहा है। कभी-कभी ऐसे स्थल भी अनुभूति में आते हैं, जहाँ व्यक्ति उसके आलिंगन में स्वयं संपूर्ण विश्व को कुछ समय के लिए ऐसे भूल जाता है, मानो कोई पुरुष अपनी प्रिया के आलिंगन में स्वयं को और विश्व को भूल जाता हो। भावना के उद्गम के विषय में यह उक्ति __(80)__ ही है।
रिक्त स्थान (77) के लिए उचित विकल्प चुनिए।
A.नेति-नेति
B.चेतनकी
C.नेति-धेती
D.वेद-वर्ती
Solution
गद्यांश रिक्त-स्थान
वाक्य कहता है कि वैदिक ऋषि ब्रह्म का रूप गढ़ने का भरसक प्रयत्न करके भी हताश हो गए और अंततः कुछ ‘करके रह गए’।
उपनिषदों में ब्रह्म के अनिर्वचनीय स्वरूप के लिए प्रसिद्ध उक्ति है ‘नेति-नेति’, अर्थात् ‘यह भी नहीं, यह भी नहीं’।
अगला वाक्य - ‘उन्होंने उसे अरूप ही रहने दिया’ - इसी भाव को दोहराता है, अतः रिक्त स्थान में यही बैठता है।
‘चेतनकी’, ‘नेति-धेती’ और ‘वेद-वर्ती’ हिंदी के मान्य/प्रचलित शब्द नहीं हैं।
इसलिए सही विकल्प (a) है।
98
निर्देश (प्र. 96-100): निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
सृष्टि के प्रत्येक कार्यकलाप को अनुशासित तथा सुष्ठु रूप में गतिशील देखकर उसके __(76)__ का ज्ञान होता है। अस्तित्वगत मनुष्य में आदिकाल से यह जिज्ञासा रही है। वैदिक ऋषियों ने उसके रूप-निर्माण का भरसक प्रयत्न किया, किंतु हताश होकर वे __(77)__ करके रह गए। उसका रूप स्थिर करने में स्वयं को असमर्थ मानकर उन्होंने उसे अरूप ही रहने दिया, किंतु उसे जानने की प्रक्रिया में कई नवीन रहस्यों के __(78)__ हुए। प्राचीन आर्य दो दलों में बँट गए। उनमें से एक दल तर्क और युक्ति से ब्रह्म के रूप-निर्धारण का प्रयत्न करता रहा और दूसरे दल ने उसके रूप-निर्माण में तर्क और बुद्धि की पराजय को घोषित किया। इसी दूसरे दल के मनीषियों ने यह अनुभव किया कि मन केवल उसकी सत्ता को __(79)__ से संतुष्ट नहीं है, बल्कि अधिकाधिक उस ओर आकर्षित होता जा रहा है। कभी-कभी ऐसे स्थल भी अनुभूति में आते हैं, जहाँ व्यक्ति उसके आलिंगन में स्वयं संपूर्ण विश्व को कुछ समय के लिए ऐसे भूल जाता है, मानो कोई पुरुष अपनी प्रिया के आलिंगन में स्वयं को और विश्व को भूल जाता हो। भावना के उद्गम के विषय में यह उक्ति __(80)__ ही है।
रिक्त स्थान (78) के लिए उचित विकल्प चुनिए।
A.उदघाटन
B.उद्धरण
C.उद्घाटन
D.उदजीवीकरण
Solution
गद्यांश रिक्त-स्थान
‘कई नवीन रहस्यों के ____ हुए’ में रहस्य के खुलने या प्रकट होने का भाव अपेक्षित है।
रहस्य के खुलने को ‘उद्घाटन’ कहते हैं; ‘उत् + घाटन’ की संधि से ‘द्’ के बाद ‘घ’ जुड़ता है, अतः शुद्ध वर्तनी ‘उद्घाटन’ है, ‘उदघाटन’ नहीं।
‘उद्धरण’ का अर्थ किसी कथन को उद्धृत करना है और ‘उदजीवीकरण’ प्रसंग में निरर्थक है।
इसलिए सही विकल्प (c) है।
99
निर्देश (प्र. 96-100): निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
सृष्टि के प्रत्येक कार्यकलाप को अनुशासित तथा सुष्ठु रूप में गतिशील देखकर उसके __(76)__ का ज्ञान होता है। अस्तित्वगत मनुष्य में आदिकाल से यह जिज्ञासा रही है। वैदिक ऋषियों ने उसके रूप-निर्माण का भरसक प्रयत्न किया, किंतु हताश होकर वे __(77)__ करके रह गए। उसका रूप स्थिर करने में स्वयं को असमर्थ मानकर उन्होंने उसे अरूप ही रहने दिया, किंतु उसे जानने की प्रक्रिया में कई नवीन रहस्यों के __(78)__ हुए। प्राचीन आर्य दो दलों में बँट गए। उनमें से एक दल तर्क और युक्ति से ब्रह्म के रूप-निर्धारण का प्रयत्न करता रहा और दूसरे दल ने उसके रूप-निर्माण में तर्क और बुद्धि की पराजय को घोषित किया। इसी दूसरे दल के मनीषियों ने यह अनुभव किया कि मन केवल उसकी सत्ता को __(79)__ से संतुष्ट नहीं है, बल्कि अधिकाधिक उस ओर आकर्षित होता जा रहा है। कभी-कभी ऐसे स्थल भी अनुभूति में आते हैं, जहाँ व्यक्ति उसके आलिंगन में स्वयं संपूर्ण विश्व को कुछ समय के लिए ऐसे भूल जाता है, मानो कोई पुरुष अपनी प्रिया के आलिंगन में स्वयं को और विश्व को भूल जाता हो। भावना के उद्गम के विषय में यह उक्ति __(80)__ ही है।
रिक्त स्थान (79) के लिए उचित विकल्प चुनिए।
A.जिहासा
B.जिज्ञासा
C.जिघांसा
D.जिगीषा
Solution
गद्यांश रिक्त-स्थान
प्रसंग यह है कि मन उस परम सत्ता को केवल जान लेने भर से संतुष्ट नहीं होता, बल्कि अधिकाधिक उसकी ओर आकर्षित होता जाता है।
जानने की इच्छा को ‘जिज्ञासा’ कहते हैं, और यही शब्द गद्यांश में पहले भी आया है - ‘आदिकाल से यह जिज्ञासा रही है’।
‘जिहासा’ त्यागने की इच्छा, ‘जिघांसा’ मारने की इच्छा और ‘जिगीषा’ जीतने की इच्छा है - इनमें से किसी का प्रसंग से मेल नहीं।
इसलिए सही विकल्प (b) है।
100
निर्देश (प्र. 96-100): निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
सृष्टि के प्रत्येक कार्यकलाप को अनुशासित तथा सुष्ठु रूप में गतिशील देखकर उसके __(76)__ का ज्ञान होता है। अस्तित्वगत मनुष्य में आदिकाल से यह जिज्ञासा रही है। वैदिक ऋषियों ने उसके रूप-निर्माण का भरसक प्रयत्न किया, किंतु हताश होकर वे __(77)__ करके रह गए। उसका रूप स्थिर करने में स्वयं को असमर्थ मानकर उन्होंने उसे अरूप ही रहने दिया, किंतु उसे जानने की प्रक्रिया में कई नवीन रहस्यों के __(78)__ हुए। प्राचीन आर्य दो दलों में बँट गए। उनमें से एक दल तर्क और युक्ति से ब्रह्म के रूप-निर्धारण का प्रयत्न करता रहा और दूसरे दल ने उसके रूप-निर्माण में तर्क और बुद्धि की पराजय को घोषित किया। इसी दूसरे दल के मनीषियों ने यह अनुभव किया कि मन केवल उसकी सत्ता को __(79)__ से संतुष्ट नहीं है, बल्कि अधिकाधिक उस ओर आकर्षित होता जा रहा है। कभी-कभी ऐसे स्थल भी अनुभूति में आते हैं, जहाँ व्यक्ति उसके आलिंगन में स्वयं संपूर्ण विश्व को कुछ समय के लिए ऐसे भूल जाता है, मानो कोई पुरुष अपनी प्रिया के आलिंगन में स्वयं को और विश्व को भूल जाता हो। भावना के उद्गम के विषय में यह उक्ति __(80)__ ही है।
रिक्त स्थान (80) के लिए उचित विकल्प चुनिए।
A.संगत
B.सहंत
C.शंकुत
D.संध
Solution
गद्यांश रिक्त-स्थान
अंतिम वाक्य पूर्ववर्ती उपमा - प्रिया के आलिंगन में स्वयं और विश्व को भूल जाना - पर टिप्पणी करता है।
लेखक कहना चाहता है कि भावना के उद्गम के विषय में वह उक्ति प्रसंग के अनुकूल, अर्थात् ‘संगत’ ही है।
‘सहंत’, ‘शंकुत’ और ‘संध’ हिंदी के मान्य शब्द नहीं हैं, अतः वे विचारणीय ही नहीं।
इसलिए सही विकल्प (a) है।
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