SSC GD Constable 20 February 2025 · Shift 3 · Hindi — questions with answers · ShikshaSphere
Chapter 180 of 210
20 February 2025 · Shift 3
Hindi
20 questions ~20 min readFree
20 questions
A
81
‘हमें अच्छे साहित्य का अध्यन करना चाहिए।’ वाक्य में रेखांकित शब्द की शुद्ध वर्तनी है-
A.अध्यान
B.अध्यन
C.अध्यययन
D.अध्ययन
Solution
शुद्ध वर्तनी
‘अधि’ + ‘अयन’ की संधि से ‘अध्ययन’ बनता है, इसी कारण शब्द में ‘ध्य’ के बाद एक और ‘य’ आता है - अ + ध् + य + य + न।
रेखांकित ‘अध्यन’ में यही दूसरा ‘य’ छूट गया है, इसलिए वह अशुद्ध वर्तनी है।
‘अध्यान’ में ‘आ’ की अनावश्यक मात्रा लग गई है और ‘अध्यययन’ में एक ‘य’ अधिक हो गया है।
इसलिए सही विकल्प (d) है।
82
हिमालय पर्वत भारत की उत्तर दिशा में स्थित है। रेखांकित शब्द में कौन-सी संज्ञा है?
A.व्यक्तिवाचक
B.भाववाचक
C.जातिवाचक
D.समूहवाचक
Solution
संज्ञा-भेद (व्यक्तिवाचक)
जो संज्ञा किसी एक विशेष व्यक्ति, स्थान या वस्तु का बोध कराए, वह व्यक्तिवाचक संज्ञा कहलाती है।
रेखांकित ‘हिमालय’ किसी एक निश्चित पर्वत का नाम है, समस्त पर्वतों की जाति का नहीं।
वाक्य में ‘पर्वत’ अवश्य जातिवाचक संज्ञा है, किंतु प्रश्न रेखांकित शब्द के बारे में है।
‘भाववाचक’ संज्ञा गुण या भाव का और ‘समूहवाचक’ समुदाय का बोध कराती है - दोनों यहाँ लागू नहीं होतीं।
इसलिए सही विकल्प (a) है।
83
‘गर्मी के मौसम में ____ लगना स्वाभाविक है।’ प्रस्तुत वाक्य के रिक्त स्थान में उचित तत्सम शब्द क्या होगा?
A.पिपासा
B.पुष्प
C.प्यास
D.पुच्छ
Solution
तत्सम शब्द
प्रश्न रिक्त स्थान के लिए तत्सम शब्द माँगता है, अर्थात् संस्कृत से ज्यों-का-त्यों लिया गया रूप।
प्यास की अनुभूति का तत्सम शब्द ‘पिपासा’ है; ‘प्यास’ उसी ‘पिपासा’ से विकसित तद्भव रूप है, तत्सम नहीं।
‘पुष्प’ (फूल) और ‘पुच्छ’ (पूँछ) तत्सम तो हैं, पर वाक्य के अर्थ से उनका कोई संबंध नहीं।
वाक्य बनेगा - गर्मी के मौसम में पिपासा लगना स्वाभाविक है।
इसलिए सही विकल्प (a) है।
84
‘दरिद्र’ का पर्याय है-
A.बलवान
B.अमीर
C.धनी
D.अकिंचन
Solution
पर्यायवाची शब्द
‘दरिद्र’ का अर्थ है - निर्धन, जिसके पास कुछ भी न हो।
‘अकिंचन’ का शाब्दिक अर्थ ही है ‘जिसके पास किंचित् (तनिक भी) कुछ न हो’, अतः यही ‘दरिद्र’ का पर्यायवाची है।
‘अमीर’ और ‘धनी’ तो ‘दरिद्र’ के विलोम हैं, और ‘बलवान’ का धन-अभाव से कोई संबंध नहीं।
इसलिए सही विकल्प (d) है।
85
दिए गए वाक्यांश के लिए एक शब्द होगा-
जिसका अंग दुरुस्त न हो
A.अपात्र
B.उपांग
C.अपात
D.अपंग
Solution
वाक्यांश के लिए एक शब्द
जिसका कोई अंग दुरुस्त न हो, अर्थात् जो अंग से विकल या हीन हो, उसके लिए एक शब्द ‘अपंग’ है।
‘अपात्र’ का अर्थ है ‘जो योग्य न हो’ और ‘उपांग’ का अर्थ है ‘किसी अंग का छोटा भाग’ - दोनों दिए गए वाक्यांश का अर्थ नहीं देते।
‘अपात’ हिंदी का प्रचलित शब्द नहीं है।
इसलिए सही विकल्प (d) है।
86
‘तिमिरमय रात अधिक भयप्रद थी।’ इस वाक्य में प्रयुक्त ‘तिमिर’ शब्द का विलोम निम्न में से कौन-सा शब्द है?
A.तामसिक
B.प्रकाश
C.तम
D.अंधकार
Solution
विलोम शब्द
‘तिमिर’ का अर्थ है अंधकार; वाक्य में ‘तिमिरमय रात’ अर्थात् अंधकार से भरी रात।
अंधकार का विलोम ‘प्रकाश’ है, इसलिए ‘तिमिर’ का विलोम भी ‘प्रकाश’ ही होगा।
‘तम’ और ‘अंधकार’ तो ‘तिमिर’ के पर्यायवाची हैं और ‘तामसिक’ भी तमोगुण से ही जुड़ा शब्द है।
इसलिए सही विकल्प (b) है।
87
इनमें से किस वाक्य में त्रुटि है?
A.उनके गुप्त रहस्य प्रकट हो गए।
B.यह तो नई प्रकार की वस्तु है।
C.पानी में कौन पड़ गया।
D.मेरी तो जान पर बन आई।
Solution
वाक्य-शुद्धि (सर्वनाम प्रयोग)
‘कौन’ प्राणिवाचक प्रश्नवाचक सर्वनाम है; निर्जीव वस्तु के लिए ‘क्या’ का प्रयोग होता है।
‘पानी में कौन पड़ गया।’ में पड़ने वाली वस्तु निर्जीव है, अतः यहाँ ‘कौन’ का प्रयोग त्रुटिपूर्ण है।
शुद्ध रूप होगा - पानी में क्या पड़ गया।
‘मेरी तो जान पर बन आई।’ में ‘जान पर बन आना’ मुहावरे का प्रयोग यथावत् शुद्ध है, इसलिए वह विकल्प भ्रामक भर है।
इसलिए सही विकल्प (c) है।
88
निम्नलिखित वाक्य में रेखांकित खंड के स्थान पर प्रयुक्त होने वाले सबसे उपयुक्त विकल्प का चयन कीजिए-
सौरभ जो ने भाषण दिया, वह तथ्यपूर्ण था।
A.भाषण दिया जो
B.ने भाषण दिया जो
C.भाषण दिया ने जो
D.ने जो भाषण दिया
Solution
पदक्रम-शुद्धि
संबंधवाचक युग्म ‘जो … वह’ में ‘जो’ अपने उपवाक्य के आरंभ में आता है, अंत में नहीं।
कर्ता के साथ ‘ने’ विभक्ति तुरंत जुड़ती है - ‘सौरभ ने’ - और उसके बाद ‘जो’ आता है।
रेखांकित खंड के स्थान पर ‘ने जो भाषण दिया’ रखने पर वाक्य बनता है - सौरभ ने जो भाषण दिया, वह तथ्यपूर्ण था।
शेष विकल्पों में या तो ‘ने’ कर्ता से अलग हो जाता है या ‘जो’ उपवाक्य के अंत में चला जाता है, जिससे पदक्रम फिर अशुद्ध रहता है।
इसलिए सही विकल्प (d) है।
89
‘दसवीं के विद्यार्थियों को हिन्दी पढ़ना ____ है।’ वाक्य के रिक्त स्थान के लिए ‘अनिवार्य’ शब्द का सर्वाधिक उपयुक्त विलोम शब्द चुनिए-
A.ऐच्छिक
B.अपरिहार्य
C.जरूरी
D.अनावश्यक
Solution
विलोम शब्द
‘अनिवार्य’ का अर्थ है - जिसे टाला न जा सके, जिसे करना ही पड़े।
इसका ठीक विलोम ‘ऐच्छिक’ है, अर्थात् जो अपनी इच्छा पर निर्भर हो।
‘अपरिहार्य’ और ‘जरूरी’ तो ‘अनिवार्य’ के ही पर्यायवाची हैं, विलोम नहीं।
‘अनावश्यक’ का अर्थ है ‘जिसकी आवश्यकता ही न हो’, जबकि वाक्य में विषय पढ़ना निरर्थक नहीं, विकल्प पर छोड़ा गया कहा जा रहा है।
इसलिए सही विकल्प (a) है।
90
निम्नलिखित वाक्य को ध्यानपूर्वक पढ़ें और सकर्मक क्रिया संबंधी त्रुटि की पहचान कर शुद्ध वाक्य का चयन करें-
मोहन अब शहर में नहीं रहता अतः राम पत्र लिखता है।
A.राम और मोहन पत्र लिखते हैं।
B.राम मोहन को पत्र लिखता है।
C.राम पत्र पढ़ता है।
D.राम संदेश लिखता है।
Solution
सकर्मक क्रिया (कर्म का अभाव)
‘लिखना’ द्विकर्मक सकर्मक क्रिया है - उसके साथ मुख्य कर्म (पत्र) के अतिरिक्त गौण कर्म (जिसे पत्र लिखा जाए) भी अपेक्षित रहता है।
दिए गए वाक्य का उत्तरार्ध ‘राम पत्र लिखता है’ यह नहीं बताता कि पत्र किसे लिखा जा रहा है, जबकि पूर्वार्ध मोहन के शहर छोड़ने की बात कहता है।
‘राम मोहन को पत्र लिखता है।’ में गौण कर्म ‘मोहन को’ जुड़ते ही क्रिया का कर्म पूरा हो जाता है और वाक्य सार्थक बनता है।
(a) में मोहन कर्म के बजाय कर्ता बन जाता है, तथा (c) और (d) क्रिया या कर्म बदलकर मूल आशय ही बदल देते हैं।
इसलिए सही विकल्प (b) है।
91
निम्नलिखित वाक्यांश के लिए सार्थक शब्द चुनिए-
जिसे लाज नहीं आती
A.निर्लज्जित
B.लज्ज
C.निर्लज्ज
D.लज्जित
Solution
वाक्यांश के लिए एक शब्द
‘निर्’ उपसर्ग का अर्थ है ‘रहित’; ‘निर् + लज्जा’ से बना ‘निर्लज्ज’ अर्थात् जिसे लाज न आती हो।
‘लज्जित’ का अर्थ इसके विपरीत है - जिसे लज्जा आ गई हो।
‘निर्लज्जित’ और ‘लज्ज’ हिंदी के मानक शब्द नहीं हैं।
इसलिए सही विकल्प (c) है।
92
‘तुम्हारी कोई मान-मर्यादा है कि नहीं, हर वक्त ____।’ उचित सार्थक शब्द-युग्म युक्त विकल्प से वाक्य पूर्ण करें-
A.मार-पीट करना तुम्हें शोभा नहीं देता
B.झगड़ा-वगड़ा तुम्हें शोभा नहीं देता
C.रोना-वोना ठीक नहीं है
D.गाली-वाली देना तुम्हें शोभा नहीं देता
Solution
सार्थक शब्द-युग्म
प्रश्न ‘सार्थक शब्द-युग्म’ माँगता है, अर्थात् ऐसा युग्म जिसके दोनों पद स्वयं अर्थवान हों।
‘मार-पीट’ में ‘मार’ और ‘पीट’ दोनों के अपने-अपने अर्थ हैं, अतः यही सार्थक शब्द-युग्म है।
‘झगड़ा-वगड़ा’, ‘रोना-वोना’ और ‘गाली-वाली’ में दूसरा पद (वगड़ा, वोना, वाली) निरर्थक अनुकरणवाची है, इसलिए वे सार्थक युग्म नहीं हैं।
अर्थ की दृष्टि से भी ‘तुम्हारी कोई मान-मर्यादा है कि नहीं, हर वक्त मार-पीट करना तुम्हें शोभा नहीं देता’ वाक्य पूर्ण होता है।
इसलिए सही विकल्प (a) है।
93
‘दाल में काला होना’ मुहावरे का सही अर्थ इनमें से क्या होगा?
A.दाल खराब होना
B.गलत कार्य होना
C.आशंका होना
D.दाल जल जाना
Solution
मुहावरा
‘दाल में काला होना’ का अर्थ है - किसी बात में कुछ गड़बड़ी की आशंका या संदेह होना।
मुहावरा गड़बड़ी के सिद्ध हो जाने की नहीं, उसके संदेह की बात कहता है, इसलिए ‘गलत कार्य होना’ इसका पूरा अर्थ नहीं देता।
‘दाल खराब होना’ और ‘दाल जल जाना’ केवल शब्दों का शाब्दिक अर्थ हैं, मुहावरे का लाक्षणिक अर्थ नहीं।
इसलिए सही विकल्प (c) है।
94
‘सगुण’ का विलोम है-
A.अमूर्त
B.निर्गुण
C.जड़
D.विभूत
Solution
विलोम शब्द
‘सगुण’ = स + गुण, अर्थात् गुणों से युक्त (साकार)।
इसका विलोम ‘निर्गुण’ है = निर् + गुण, अर्थात् गुणों से रहित (निराकार)।
‘अमूर्त’ का विलोम ‘मूर्त’ और ‘जड़’ का विलोम ‘चेतन’ होता है; ‘विभूत’ यहाँ असंगत है।
इसलिए सही विकल्प (b) है।
95
निम्न वाक्य में रेखांकित पद को संशोधित कर लिखिए-
वे सब कालचक्र के पहिए के नीचे पिस गए।
A.से
B.पहिए के साथ
C.के पहिए पर
D.में
Solution
पद-संशोधन (पुनरुक्ति दोष)
‘कालचक्र’ शब्द में ‘चक्र’ अर्थात् पहिया पहले से सम्मिलित है - काल का चक्र।
अतः उसके आगे फिर ‘के पहिए के नीचे’ जोड़ना पुनरुक्ति दोष उत्पन्न करता है।
रेखांकित पद के स्थान पर केवल ‘में’ रखने से वाक्य शुद्ध हो जाता है - वे सब कालचक्र में पिस गए।
(b) और (c) ‘पहिए’ को बनाए रखकर वही दोष दोहराते हैं, और (a) ‘से’ लगाने पर ‘पिसना’ क्रिया के साथ उपयुक्त कारक नहीं बनता।
इसलिए सही विकल्प (d) है।
96
निर्देश (प्र. 96-100): निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
सृष्टि के प्रत्येक कार्यकलाप को अनुशासित तथा सुगठित रूप में गतिशील देखकर उसके __(76)__ को जानने की अभिलाषा मनुष्य में आदिकाल से रही है। वैदिक ऋषियों ने उसके रूप-निर्माण का भरसक प्रयत्न किया, किंतु हताश होकर वे __(77)__ करके रह गये। उसका रूप स्थिर करने में स्वयं को असमर्थ मानकर उन्होंने उसे अरूप ही रहने दिया, किंतु उसे जानने की प्रक्रिया में कई नवीन रहस्यों के __(78)__ हुए। प्राचीन आर्य दो दलों में बँट गये। उनमें से एक दल तर्क और युक्ति से ब्रह्म के रूप-निर्धारण का प्रयत्न करता रहा और दूसरे दल ने उसके रूप-निर्माण में तर्क और बुद्धि की पराजय को घोषित किया। इसी दूसरे दल के मनीषियों ने यह अनुभव किया कि मन केवल उसको जानने की __(79)__ से संतुष्ट नहीं है, बल्कि अधिकाधिक उस ओर आकर्षित होता जा रहा है। कभी-कभी ऐसे स्थल भी अनुभूति में आते हैं, जहाँ व्यक्ति उसके आलिंगन में स्वयं संपूर्ण विश्व को कुछ समय के लिए ऐसे भूल जाता है, मानो कोई पुरुष अपनी प्रिया के आलिंगन में स्वयं को और विश्व को भूल जाता हो। रहस्य-भावना के उद्गम के विषय में यही उक्ति __(80)__ ही है।
रिक्त स्थान (76) के लिए उचित विकल्प चुनिए।
A.नियतांक
B.बंधक
C.चालक
D.नियंता
Solution
गद्यांश : उपयुक्त शब्द-चयन
रिक्त स्थान से पहले कहा गया है कि सृष्टि का प्रत्येक कार्यकलाप अनुशासित तथा सुगठित रूप में गतिशील है।
ऐसा अनुशासन देखकर मनुष्य उसका नियमन करने वाले, अर्थात् ‘नियंता’ को जानना चाहता है।
‘नियतांक’ (स्थिर राशि), ‘बंधक’ (गिरवी रखी वस्तु) और ‘चालक’ (वाहन चलाने वाला) प्रसंग से मेल नहीं खाते।
इसलिए सही विकल्प (d) है।
97
निर्देश (प्र. 96-100): निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
सृष्टि के प्रत्येक कार्यकलाप को अनुशासित तथा सुगठित रूप में गतिशील देखकर उसके __(76)__ को जानने की अभिलाषा मनुष्य में आदिकाल से रही है। वैदिक ऋषियों ने उसके रूप-निर्माण का भरसक प्रयत्न किया, किंतु हताश होकर वे __(77)__ करके रह गये। उसका रूप स्थिर करने में स्वयं को असमर्थ मानकर उन्होंने उसे अरूप ही रहने दिया, किंतु उसे जानने की प्रक्रिया में कई नवीन रहस्यों के __(78)__ हुए। प्राचीन आर्य दो दलों में बँट गये। उनमें से एक दल तर्क और युक्ति से ब्रह्म के रूप-निर्धारण का प्रयत्न करता रहा और दूसरे दल ने उसके रूप-निर्माण में तर्क और बुद्धि की पराजय को घोषित किया। इसी दूसरे दल के मनीषियों ने यह अनुभव किया कि मन केवल उसको जानने की __(79)__ से संतुष्ट नहीं है, बल्कि अधिकाधिक उस ओर आकर्षित होता जा रहा है। कभी-कभी ऐसे स्थल भी अनुभूति में आते हैं, जहाँ व्यक्ति उसके आलिंगन में स्वयं संपूर्ण विश्व को कुछ समय के लिए ऐसे भूल जाता है, मानो कोई पुरुष अपनी प्रिया के आलिंगन में स्वयं को और विश्व को भूल जाता हो। रहस्य-भावना के उद्गम के विषय में यही उक्ति __(80)__ ही है।
रिक्त स्थान (77) के लिए उचित विकल्प चुनिए।
A.नीति-धोती
B.चेतनकी
C.नेक-बस्ती
D.नेति-नेति
Solution
गद्यांश : पारिभाषिक उक्ति
गद्यांश कहता है कि वैदिक ऋषि ब्रह्म के रूप-निर्माण में हताश हो गए।
उपनिषदों में ब्रह्म के लिए यही अनिर्वचनीयता ‘नेति-नेति’ (न इति, न इति = यह भी नहीं, यह भी नहीं) कहकर व्यक्त की गई है।
इसीलिए आगे कहा गया कि उन्होंने उसे अरूप ही रहने दिया - जो ‘नेति-नेति करके रह गये’ से पूरी तरह मेल खाता है।
‘नीति-धोती’, ‘चेतनकी’ और ‘नेक-बस्ती’ निरर्थक शब्द-समूह हैं।
इसलिए सही विकल्प (d) है।
98
निर्देश (प्र. 96-100): निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
सृष्टि के प्रत्येक कार्यकलाप को अनुशासित तथा सुगठित रूप में गतिशील देखकर उसके __(76)__ को जानने की अभिलाषा मनुष्य में आदिकाल से रही है। वैदिक ऋषियों ने उसके रूप-निर्माण का भरसक प्रयत्न किया, किंतु हताश होकर वे __(77)__ करके रह गये। उसका रूप स्थिर करने में स्वयं को असमर्थ मानकर उन्होंने उसे अरूप ही रहने दिया, किंतु उसे जानने की प्रक्रिया में कई नवीन रहस्यों के __(78)__ हुए। प्राचीन आर्य दो दलों में बँट गये। उनमें से एक दल तर्क और युक्ति से ब्रह्म के रूप-निर्धारण का प्रयत्न करता रहा और दूसरे दल ने उसके रूप-निर्माण में तर्क और बुद्धि की पराजय को घोषित किया। इसी दूसरे दल के मनीषियों ने यह अनुभव किया कि मन केवल उसको जानने की __(79)__ से संतुष्ट नहीं है, बल्कि अधिकाधिक उस ओर आकर्षित होता जा रहा है। कभी-कभी ऐसे स्थल भी अनुभूति में आते हैं, जहाँ व्यक्ति उसके आलिंगन में स्वयं संपूर्ण विश्व को कुछ समय के लिए ऐसे भूल जाता है, मानो कोई पुरुष अपनी प्रिया के आलिंगन में स्वयं को और विश्व को भूल जाता हो। रहस्य-भावना के उद्गम के विषय में यही उक्ति __(80)__ ही है।
रिक्त स्थान (78) के लिए उचित विकल्प चुनिए।
A.उद्जनीकरण
B.उद्गदान
C.उद्हरण
D.उद्घाटन
Solution
गद्यांश : उपयुक्त शब्द-चयन
रहस्य के ‘खुलने’ या ‘प्रकट होने’ के लिए हिंदी में ‘उद्घाटन’ शब्द रूढ़ है।
वाक्य बनता है - उसे जानने की प्रक्रिया में कई नवीन रहस्यों के उद्घाटन हुए।
‘उद्जनीकरण’, ‘उद्गदान’ और ‘उद्हरण’ हिंदी के मानक शब्द नहीं हैं।
इसलिए सही विकल्प (d) है।
99
निर्देश (प्र. 96-100): निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
सृष्टि के प्रत्येक कार्यकलाप को अनुशासित तथा सुगठित रूप में गतिशील देखकर उसके __(76)__ को जानने की अभिलाषा मनुष्य में आदिकाल से रही है। वैदिक ऋषियों ने उसके रूप-निर्माण का भरसक प्रयत्न किया, किंतु हताश होकर वे __(77)__ करके रह गये। उसका रूप स्थिर करने में स्वयं को असमर्थ मानकर उन्होंने उसे अरूप ही रहने दिया, किंतु उसे जानने की प्रक्रिया में कई नवीन रहस्यों के __(78)__ हुए। प्राचीन आर्य दो दलों में बँट गये। उनमें से एक दल तर्क और युक्ति से ब्रह्म के रूप-निर्धारण का प्रयत्न करता रहा और दूसरे दल ने उसके रूप-निर्माण में तर्क और बुद्धि की पराजय को घोषित किया। इसी दूसरे दल के मनीषियों ने यह अनुभव किया कि मन केवल उसको जानने की __(79)__ से संतुष्ट नहीं है, बल्कि अधिकाधिक उस ओर आकर्षित होता जा रहा है। कभी-कभी ऐसे स्थल भी अनुभूति में आते हैं, जहाँ व्यक्ति उसके आलिंगन में स्वयं संपूर्ण विश्व को कुछ समय के लिए ऐसे भूल जाता है, मानो कोई पुरुष अपनी प्रिया के आलिंगन में स्वयं को और विश्व को भूल जाता हो। रहस्य-भावना के उद्गम के विषय में यही उक्ति __(80)__ ही है।
रिक्त स्थान (79) के लिए उचित विकल्प चुनिए।
A.जिज्ञासा
B.जिहासा
C.जिघांसा
D.जिगीषा
Solution
गद्यांश : शब्द-भेद (इच्छावाचक)
रिक्त स्थान ‘जानने की ____’ के रूप में आया है, अतः वहाँ जानने की इच्छा का बोध कराने वाला शब्द चाहिए - ‘जिज्ञासा’।
‘जिघांसा’ का अर्थ है मारने की इच्छा, ‘जिगीषा’ का जीतने की इच्छा और ‘जिहासा’ का त्यागने की इच्छा।
वाक्य बनता है - मन केवल उसको जानने की जिज्ञासा से संतुष्ट नहीं है, बल्कि अधिकाधिक उस ओर आकर्षित होता जा रहा है।
इसलिए सही विकल्प (a) है।
100
निर्देश (प्र. 96-100): निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
सृष्टि के प्रत्येक कार्यकलाप को अनुशासित तथा सुगठित रूप में गतिशील देखकर उसके __(76)__ को जानने की अभिलाषा मनुष्य में आदिकाल से रही है। वैदिक ऋषियों ने उसके रूप-निर्माण का भरसक प्रयत्न किया, किंतु हताश होकर वे __(77)__ करके रह गये। उसका रूप स्थिर करने में स्वयं को असमर्थ मानकर उन्होंने उसे अरूप ही रहने दिया, किंतु उसे जानने की प्रक्रिया में कई नवीन रहस्यों के __(78)__ हुए। प्राचीन आर्य दो दलों में बँट गये। उनमें से एक दल तर्क और युक्ति से ब्रह्म के रूप-निर्धारण का प्रयत्न करता रहा और दूसरे दल ने उसके रूप-निर्माण में तर्क और बुद्धि की पराजय को घोषित किया। इसी दूसरे दल के मनीषियों ने यह अनुभव किया कि मन केवल उसको जानने की __(79)__ से संतुष्ट नहीं है, बल्कि अधिकाधिक उस ओर आकर्षित होता जा रहा है। कभी-कभी ऐसे स्थल भी अनुभूति में आते हैं, जहाँ व्यक्ति उसके आलिंगन में स्वयं संपूर्ण विश्व को कुछ समय के लिए ऐसे भूल जाता है, मानो कोई पुरुष अपनी प्रिया के आलिंगन में स्वयं को और विश्व को भूल जाता हो। रहस्य-भावना के उद्गम के विषय में यही उक्ति __(80)__ ही है।
रिक्त स्थान (80) के लिए उचित विकल्प चुनिए।
A.संगंध
B.संगत
C.शकुंत
D.संहत
Solution
गद्यांश : उपयुक्त शब्द-चयन
अंतिम वाक्य लेखक का निष्कर्ष है - रहस्य-भावना के उद्गम के विषय में यह उक्ति उचित ही है।
‘संगत’ का अर्थ ही है प्रसंग के अनुकूल, तर्कसंगत; इसलिए वही रिक्त स्थान में बैठता है।
‘संहत’ (सटा हुआ, गठित), ‘शकुंत’ (पक्षी) और ‘संगंध’ इस प्रसंग में निरर्थक हैं।
इसलिए सही विकल्प (b) है।
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